भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की कहानियों में शिशुपाल का प्रसंग एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. शिशुपाल, जो रिश्ते में श्रीकृष्ण का भाई था, उनकी बुआ का पुत्र था.
जब शिशुपाल का जन्म हुआ, तो वह कोई साधारण बालक नहीं था. उसके तीन आंखें और चार हाथ थे, जिसे देखकर सभी भयभीत और हैरान हो गए. जब भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ अपनी बुआ के घर नवजात शिशु को देखने पहुंचे, तो उन्होंने अपनी बुआ को अत्यंत दुखी पाया. पूछने पर बुआ ने शिशुपाल की विचित्रता और उसके भविष्य से जुड़ी ज्योतिषीय भविष्यवाणी के बारे में बताया.
कृष्ण ने अपने नन्हे भाई को देखने की इच्छा जताई. जैसे ही उन्होंने बालक को अपनी गोद में लिया, एक चमत्कार हुआ. शिशुपाल के अतिरिक्त हाथ और आंखें गायब हो गईं और वह एक सामान्य बालक की तरह दिखने लगा. लेकिन इस चमत्कार के साथ ही एक भविष्यवाणी भी जुड़ी थी. ज्योतिषियों ने बताया था कि जिसकी गोद में जाने से यह बालक सामान्य होगा, वही उसका काल बनेगा.
यह जानकर कृष्ण की बुआ व्याकुल हो गईं और कृष्ण से अपने ही भाई को न मारने का वचन मांगने लगीं. तब श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाते हुए कहा कि हर व्यक्ति अपने कर्मों से बंधा है और इस जन्म में जो भी होता है, वह पूर्व जन्मों का फल है. अपनी रोती हुई बुआ को सांत्वना देते हुए कृष्ण ने वचन दिया कि वह शिशुपाल के सौ अपराधों को क्षमा करेंगे, लेकिन उसके बाद उसे अपने कर्मों का फल भुगतना ही होगा.
समय बीतता गया और शिशुपाल बड़ा हुआ. वह देवी रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, जिनसे भगवान श्रीकृष्ण भी प्रेम करते थे. जब श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मिणी से हो गया, तो शिशुपाल इसे अपना घोर अपमान समझ बैठा और श्रीकृष्ण को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानने लगा. उसके मन में कृष्ण के प्रति ईर्ष्या और घृणा की अग्नि धधकने लगी.
यह शत्रुता तब और भी बढ़ गई जब धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में सभी राजाओं के बीच भगवान श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ सम्मान दिया गया. यह देखकर शिशुपाल क्रोध से भर गया और भरी सभा में श्रीकृष्ण का अपमान करने लगा. एक के बाद एक, वह श्रीकृष्ण को अपशब्द कहता गया. श्रीकृष्ण अपने वचन के अनुसार शांत रहे और उसके हर अपराध को गिनते रहे.
जैसे ही शिशुपाल ने सौ अपमान पूरे किए, कृष्ण ने उसे एक अंतिम बार चेतावनी दी. लेकिन अहंकार और घृणा में अंधा शिशुपाल नहीं रुका और उसने 101वीं बार श्रीकृष्ण का अपमान किया. उसी क्षण, श्रीकृष्ण का वचन पूरा हुआ और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया. इस प्रकार, शिशुपाल अपने कर्मों के फल को प्राप्त हुआ और भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना की.
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