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भूलकर भी मत करना ये गलती, जो चाँद ने की थी!

एक बार धन के देवता कुबेर ने अपने वैभव और संपन्नता का घमंड दिखाने के लिए भगवान गणेश को अपने घर आमंत्रित किया। गणपति बप्पा वहाँ गए और कुबेर के अभिमान को भंग कर उन्हें विनम्रता का सच्चा पाठ पढ़ाया। जब वे लौट रहे थे, तब अपने प्रिय वाहन मूषक पर सवार थे।

मार्ग में शीघ्रता के कारण मूषक महाराज लड़खड़ा गए और असंतुलित होकर फिसल पड़े। इससे गणपति बप्पा भी उनके पीठ से गिर गए। प्रभु उठ खड़े हुए और जैसे ही उन्होंने स्वयं को सँभाला, तभी आकाश में ठहाकों की गूँज सुनाई दी।
ऊपर देखा तो चंद्रदेव अपने अहंकार में डूबे, गणेशजी के शरीर और उनकी सवारी का उपहास कर हँस रहे थे। यह देखकर विघ्नहर्ता को अत्यंत दुःख पहुँचा। चंद्रदेव ने व्यंग्य और अभिमान से भरे शब्दों में उनका उपहास किया।

गजानन का क्रोध प्रज्वलित हुआ और उन्होंने चंद्र को श्राप दिया –
“हे चंद्र! जिस तेज और शोभा पर तुम्हें इतना अभिमान है, वह आज से तुमसे दूर हो जाएगी।”
ज्यों ही वचन उच्चरित हुए, चंद्रमा का उज्ज्वल रूप म्लान पड़ गया। उनका रंग काला हो गया और चारों ओर गहन अंधकार छा गया। अपनी भूल का एहसास होते ही चंद्रदेव भयभीत हो भगवान गणेश के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने क्षमा माँगी और श्राप से मुक्त होने की प्रार्थना की।

गणेशजी ने कहा –
“हे चंद्र! मेरा दिया हुआ श्राप वापस नहीं हो सकता, किंतु तुम्हें वरदान अवश्य मिलेगा। मास के सभी दिनों में केवल एक ही दिन तुम्हारा तेज पूर्णत: लुप्त होगा, जिसे अमावस्या कहा जाएगा। शेष दिनों में तुम्हारा प्रकाश घटेगा-बढ़ेगा, और विशेष पर्वों पर तुम्हारी पूजा भी होगी। इस प्रकार संसार तुम्हारे महत्व को स्मरण करता रहेगा।”

तब से ही चंद्रमा का घटना-बढ़ना आरंभ हुआ और अमावस्या की रात अंधकारमय बन गई।

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