रामनगर (नैनीताल): कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ एलीफेंट कैंप से इंसान और वन्यजीव के बीच गहरे भावनात्मक रिश्ते का एक अनोखा और भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है। कैंप में तैनात 60 वर्षीय वन दारोगा भारत सिंह रावत ने अपनी सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के मौके पर एक नन्ही हथिनी से विदा लेते समय कुछ ऐसा किया, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। रावत ने जाने से पहले 9 महीने की अनाथ हथिनी ‘मालिनी’ के पैर छुए, उसे गले लगाया और फूट-फूटकर रो पड़े।
वन दारोगा भारत सिंह रावत और मालिनी का रिश्ता महज एक वन कर्मी और वन्यजीव का नहीं, बल्कि पिता और संतान जैसा था। दरअसल, लगभग दस महीने पहले (4 सितंबर 2025 को) कोटद्वार के कण्वाश्रम क्षेत्र के समीप मालन नदी के तेज बहाव में करीब 15 से 20 दिन की एक हथिनी की बच्ची फंसी मिली थी। वह बेहद कमजोर और मरणासन्न अवस्था में थी।
वन विभाग की टीम ने उसे सुरक्षित रेस्क्यू किया और इलाज व उचित देखभाल के लिए कालागढ़ एलीफेंट कैंप पहुंचाया। मालन नदी से मिलने के कारण इसका नाम ‘मालिनी’ रखा गया और 19 फरवरी 2026 को वन एवं पर्यावरण मंत्री सुबोध उनियाल की मौजूदगी में विधि-विधान से इसका नामकरण संस्कार किया गया था।
कैंप में मालिनी की जिम्मेदारी मिलते ही भारत सिंह रावत ने उसे अपना बच्चा मान लिया।
सेवानिवृत्ति पर आयोजित विदाई समारोह के दौरान वन अधिकारियों और कर्मचारियों ने भारत सिंह के वन्यजीव संरक्षण के प्रति उनके समर्पण की सराहना की। जब भारत सिंह ने मालिनी के पैर छुए और उसे गले लगाया, तो कैंप में सन्नाटा पसर गया और वहां मौजूद महावतों, वन अधिकारियों समेत हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
वर्तमान में कालागढ़ एलीफेंट कैंप में चार हाथी हैं— गजराज, लक्षमा, सावन और मालिनी। इनकी देखभाल के लिए तीन महावत, तीन चाराकटर और एक गेटकीपर तैनात हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पशु चिकित्सक डॉ. दुष्यंत कुमार शर्मा लगातार इनकी सेहत पर नजर रखते हैं। भारत सिंह की सेवानिवृत्ति के बाद अब एलीफेंट कैंप की कमान रक्षित पांडेय को सौंपी गई है।
इस भावुक विदाई पर कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने कहा:
“दूरस्थ वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की सुरक्षा में तैनात वनकर्मी स्वभाव से अत्यंत संवेदनशील होते हैं। जब कोई कर्मचारी किसी अनाथ या घायल वन्यजीव को रेस्क्यू कर उसका पालन-पोषण करता है, तो उसके साथ एक गहरा आत्मीय व भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है। सेवानिवृत्ति के समय ऐसे जीवों से बिछड़ने का पल वाकई भावुक और अविस्मरणीय होता है। यह दर्शाता है कि सेवा और समर्पण की भाषा सिर्फ इंसान ही नहीं, मूक वन्यजीव भी बखूबी समझते हैं।”
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