कहावत: बया का घोंसला हम सभी ने देखा है कि कितने बढ़िया तरीके से बनाती है. उस में गर्मी से, सर्दी से, बरसात से सब से बचने का इंतजाम होता है.
एक बार जाड़े की बरसात के दौरान एक बया अपने घोसले से बाहर निकली तो क्या देखती है कि एक बंदर पेड़ की डाल पर बैठा वरिश में भीग कर थरथर काँप रहा है. उसे बंदर की हालत पर दया भी आई और उसकी नासमझी पर गुस्सा भी.
उसने बंदर से कहा – भैया! तुमने अपने लिए घर क्यों नहीं बनाया. बंदर इस बात से चिढ़ गया और बोला, तुझे क्या मतलब मैं कैसे भी रहूं. लेकिन बयां नहीं मानी, उसने फिर से बंदर को नसीहत देने की कोशिश की – मानुष जैसे हाथ पांव हैं, मानुष जैसी काया, चार महीने वर्षा बीती, छप्पर क्यों नहीं छाया.
बंदर गुस्से में उस पर झपटा. बया ने उड़ कर अपनी जान तो बचा ली पर बंदर ने खिसिया कर उस का घर तोड़ दिया.
इसी पर कहावत बनी है – सीख उसी को दीजिए, जा को सीख सुहाए, सीख जो दीन्ही बांदरा, चिड़िया का घर जाए.
देहरादून |मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में शुक्रवार को राज्य मंत्रिमंडल की अहम बैठक…
देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में शुक्रवार को आयोजित उत्तराखंड मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की…
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने राज्य के किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने तथा ग्रामीण क्षेत्रों…
देहरादून। लंबे समय से भू-धंसाव और मकानों में दरारों की मार झेल रहे ज्योतिर्मठ (पूर्व…
हरिद्वार: भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बेंगलुरु दक्षिण से भाजपा सांसद…
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) अभियान के बीच चुनाव आयोग…