सनातन धर्म में काल गणना का अपना ही महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि के आरंभ में समय और महीनों का विभाजन हो रहा था, तब हर महीने को एक अधिष्ठाता देवता प्राप्त हुए। चैत्र से लेकर फाल्गुन तक सभी 12 महीनों को देवताओं ने सहर्ष स्वीकार कर लिया, ताकि भक्त उन महीनों में अपने आराध्य की उपासना कर सकें।
एक ‘अवांछित’ महीने का जन्म
लेकिन समय के चक्र में हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त मास जुड़ता था, जिसे ‘मलमास’ या ‘अधिमास’ कहा गया। क्योंकि इस महीने का कोई स्वामी देवता नहीं था, इसलिए इसे ‘मलिन’ मान लिया गया। समाज में इसे अशुद्ध घोषित कर दिया गया। मानों और शुभ कार्यों पर रोक लग गई। कोई भी इस महीने को अपनाकर अपनी प्रतिष्ठा खराब नहीं करना चाहता था।
बैकुंठ में गुहार
अपमान और उपेक्षा से आहत, मलमास अत्यंत दुखी था। वह रोते-बिलखते हुए बैकुंठ धाम पहुँचा और भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में गिर पड़ा। उसने अपने आँसुओं से प्रभु के चरणों को भिगो दिया।
मलमास ने करुण स्वर में कहा, “हे प्रभु! पूरी सृष्टि में मेरा कोई स्वामी नहीं है। सब मुझे अशुद्ध और त्याज्य मानते हैं। मैं क्या करूँ? मेरा जन्म ही यदि तिरस्कार के लिए हुआ है, तो मैं कहाँ जाऊँ?”
करुणा के सागर का वरदान
मलमास की व्यथा सुनकर करुणासागर भगवान विष्णु का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने मलमास को उठाया और अपने गले से लगा लिया। भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे मास! अब तुम दुखी मत हो। आज से मैं तुम्हें अपना ही स्वरूप प्रदान करता हूँ। मैं तुम्हें अपना श्रेष्ठ नाम ‘पुरुषोत्तम’ देता हूँ।”
भगवान विष्णु ने वरदान देते हुए आगे कहा, “आज से तुम ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से जाने जाओगे। मैं स्वयं इस महीने का स्वामी हूँ। जो भी भक्त इस पावन महीने में मेरा स्मरण, भक्ति, दान-पुण्य और स्नान करेगा, उसे अन्य महीनों की तुलना में करोड़ों गुना अधिक फल और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी।”
तभी से बदल गई महिमा
भगवान विष्णु के इस आशीर्वाद से मलमास का दुर्भाग्य सदा के लिए मिट गया। जो महीना कभी तिरस्कृत था, वह अब सभी महीनों में ‘श्रेष्ठ’ बन गया। तभी से ‘पुरुषोत्तम मास’ में की गई पूजा, अनुष्ठान और दान को मोक्ष प्रदान करने वाला और समस्त पापों का नाश करने वाला माना जाता है।
सीख: यह कहानी हमें सिखाती है कि संसार में कोई भी जीव या समय ‘अशुद्ध’ नहीं होता। यदि ईश्वर की कृपा और दृष्टि मिल जाए, तो सबसे उपेक्षित व्यक्ति या वस्तु भी ‘पुरुषोत्तम’ (श्रेष्ठ) बन सकती है। बस आवश्यकता है तो प्रभु के प्रति सच्चे समर्पण की।
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