Dharam Jyotish

सिंदूरासुर का वध और गणेश जी का सिंदूरी स्वरूप

प्राचीन काल की बात है, जब दैत्य और दानव देवताओं को त्रस्त किया करते थे। उन्हीं दैत्यों में एक ऐसा राक्षस जन्मा जिसका रंग दहकते हुए अंगारे जैसा लाल था। उसका नाम था— सिंदूरासुर।
सिंदूरासुर का आतंक:
सिंदूरासुर साधारण राक्षस नहीं था। जन्म के समय से ही उसके शरीर का रंग सिंदूरी (लाल) था, जिसके कारण उसे ‘सिंदूरासुर’ कहा गया। उसने कठिन तपस्या करके ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। वरदान के मद में चूर होकर उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसने न केवल मनुष्यों को प्रताड़ित किया, बल्कि इंद्रदेव को हराकर स्वर्ग पर भी अपना अधिकार कर लिया।
देवताओं की पुकार:
सिंदूरासुर के अत्याचारों से दुखी होकर सभी देवता भगवान शिव के पास पहुँचे। शिव जी ने उन्हें बताया कि इस संकट का समाधान केवल भगवान गणेश ही कर सकते हैं। तब देवताओं ने मिलकर गणेश जी की स्तुति की। देवताओं की करुण पुकार सुनकर गणेश जी ने अवतार लिया।
भीषण युद्ध:
जब गणेश जी सिंदूरासुर के सामने पहुँचे, तो उस अहंकारी राक्षस ने बालक रूपी गणेश का उपहास किया। लेकिन जैसे ही युद्ध शुरू हुआ, सिंदूरासुर को गणेश जी की शक्ति का आभास हो गया। दोनों के बीच कई दिनों तक भीषण युद्ध चला। सिंदूरासुर अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग कर रहा था, तो वहीं गणेश जी अपने अस्त्र-शस्त्रों से उसका प्रतिकार कर रहे थे।
अंत और विजय:
अंततः, गणेश जी ने अपने विराट रूप को धारण किया और सिंदूरासुर को पकड़कर अपनी भुजाओं में इतना जोर से भींचा (मसल दिया) कि उस राक्षस के प्राण पखेरू उड़ गए। जैसे ही सिंदूरासुर का अंत हुआ, उसके शरीर से भारी मात्रा में लाल रक्त निकला, जो बिल्कुल सिंदूर की तरह चमक रहा था।
सिंदूरी चोला:
गणेश जी ने उस राक्षस के अहंकार को समाप्त करने के प्रतीक के रूप में उसके रक्त (सिंदूर) को अपने पूरे शरीर पर मल लिया। इससे गणेश जी का पूरा शरीर सिंदूरी आभा से चमक उठा। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और उन्हें ‘सिंदूरवदन’ कहकर पुकारा।
भगवान का वरदान:
वध के पश्चात, प्रसन्न होकर गणेश जी ने कहा— “आज से सिंदूर मुझे अत्यंत प्रिय होगा। जो भी भक्त पूरी श्रद्धा के साथ मुझ पर सिंदूर अर्पित करेगा, मैं उसके जीवन के सभी विघ्न-बाधाओं को हर लूँगा। उसके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा।”
उपसंहार:
यही कारण है कि आज भी किसी भी शुभ कार्य से पहले जब गणेश जी की पूजा की जाती है, तो उन्हें लाल सिंदूर का तिलक लगाया जाता है या उन्हें पूरी तरह सिंदूर से सराबोर किया जाता है। यह सिंदूर केवल एक रंग नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत और भक्तों के प्रति भगवान के प्रेम का प्रतीक है।

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