नई दिल्ली। सनातन धर्म में अधिकमास (मलमास या पुरुषोत्तम मास) में आने वाली एकादशी का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस पावन महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘पद्मिनी एकादशी’ कहा जाता है, जिसे ‘कमला एकादशी’ या ‘पुरुषोत्तमी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ का अधिकमास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा और इसी के बीच 27 मई को यह दुर्लभ एकादशी व्रत रखा जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कमला एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होते हैं, जिससे जीवन में चल रही आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और पितरों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, पद्मिनी (कमला) एकादशी की तिथि का समय इस प्रकार रहेगा:
पद्म पुराण के अनुसार, कमला एकादशी के दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करना अत्यंत कल्याणकारी होता है। अलग-अलग स्थानों पर किए गए जप का फल भी भिन्न-भिन्न होता है:
त्रेतायुग में कीर्तवीर्य नाम का एक प्रतापी राजा था। उसकी कई रानियां थीं, लेकिन किसी को भी संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ था। संतानहीनता के दुख से व्याकुल होकर राजा अपनी रानियों के साथ वन में हज़ारों वर्षों तक कठोर तपस्या करने चले गए। कठिन तप के बाद भी जब मनोकामना पूरी नहीं हुई, तब रानी ने देवी अनुसूया से इसका उपाय पूछा।
देवी अनुसूया ने रानी को मलमास (अधिकमास) के शुक्ल पक्ष में आने वाली पद्मिनी एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान से करने का मार्ग सुझाया। रानी ने श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। जब भगवान ने रानी से वरदान मांगने को कहा, तो रानी ने अपने पति (राजा) के लिए वरदान मांगा।
राजा ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, “मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण संपन्न हो, तीनों लोकों में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त ब्रह्मांड में किसी से भी पराजित न हो।”
भगवान ने ‘तथास्तु’ कहा और कुछ समय बाद रानी ने एक अत्यंत पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन रखा गया। इसी बालक ने आगे चलकर अपनी शक्ति के बल पर लंकापति रावण को भी बंदी बना लिया था। मान्यता है कि महाभारत काल में सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस एकादशी के महत्व और इस पावन कथा से अवगत कराया था।
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