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ग़ायब हो जाएँगे केदारनाथ-बद्रीनाथ!

हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पुराणों में से एक, स्कंद पुराण में भविष्य को लेकर कई बातें कही गई हैं। इन्हीं में से एक भविष्यवाणी है जो हर किसी को चौंका देती है – एक समय ऐसा आएगा जब केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे पवित्र धाम लुप्त हो जाएंगे। यह कहानी उसी भविष्यवाणी और उसके बाद की घटनाओं पर आधारित है। सदियों से, हिमालय की गोद में बसे केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र रहे हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए इन तीर्थों के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, ताकि भगवान शिव और विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ सकें। लेकिन स्कंद पुराण में वर्णित एक भविष्यवाणी के अनुसार, कलियुग के चरम पर पहुंचने पर ये दोनों ही धाम आम लोगों की पहुंच से दूर हो जाएंगे।

स्कंद पुराण के अनुसार, जब कलियुग अपने अंतिम चरण में होगा, तब नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे। इस घटना के बाद बद्रीनाथ और केदारनाथ के वर्तमान मंदिर और रास्ते पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगे। पुराण में यह भी उल्लेख है कि इस प्रलयकारी घटना से पहले कुछ संकेत भी देखने को मिलेंगे।

भविष्यवाणी के अनुसार, बद्रीनाथ धाम के लुप्त होने का पहला संकेत जोशीमठ में स्थित नरसिंह मंदिर में देखने को मिलेगा। यहां भगवान नरसिंह की एक मूर्ति स्थापित है, जिसकी एक भुजा काफी पतली है। कहा जाता है कि जिस दिन यह भुजा टूटकर गिर जाएगी, उस दिन से बद्रीनाथ धाम का रास्ता बंद हो जाएगा और वह अदृश्य हो जाएगा।स्थानीय पुजारियों और कुछ रिपोर्टों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भगवान नरसिंह की मूर्ति की भुजा वास्तव में पतली हो रही हैं।
इसके अलावा, स्कंद पुराण में यह भी कहा गया है कि इस समय के दौरान पवित्र गंगा नदी भी धरती से लुप्त होकर वापस ब्रह्मा के कमंडल में चली जाएगी।

हालांकि, स्कंद पुराण की यह भविष्यवाणी आस्था के अंत की बात नहीं करती, बल्कि उसके स्वरूप बदलने का संकेत देती है। पुराणों के अनुसार, जब वर्तमान केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम लुप्त हो जाएंगे, तब नए तीर्थस्थलों का उदय होगा।
भगवान शिव की पूजा “भविष्य केदार” नामक स्थान पर की जाएगी, जबकि भगवान विष्णु की आराधना “भविष्य बद्री” में होगी।ये दोनों ही स्थान जोशीमठ के पास स्थित बताए जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि भले ही तीर्थस्थल बदल जाएं, लेकिन ईश्वर में आस्था और भक्ति का प्रवाह निरंतर बना रहेगा।

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