50 डिग्री का टॉर्चर: ये मौसम नहीं, झुलसते शहरों की चीख है

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष
50 डिग्री का टॉर्चर: ये मौसम नहीं, झुलसते शहरों की चीख है
सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
5 जून। कैलेंडर का वो तारीखी दिन, जिसे हम 'विश्व पर्यावरण दिवस' कहते हैं। इस दिन सुबह से लेकर शाम तक भाषणों की नदियां बहेंगी। फाइव स्टार होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर, हाथ में मिनरल वाटर की प्लास्टिक बोतल थामे 'ग्लोबल वार्मिंग' पर चिंता जताई जाएगी। नेता, अफसर और कॉर्पोरेट जगत के सूरमा कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए एक-एक पौधा रोपेंगे। जिसकी तस्वीरें कल के अखबारों में छपेंगी और परसों से उस पौधे को पानी देने वाला कोई नहीं होगा।
यह तमाशा हम हर साल देखते हैं। कुदरत को उजाड़ने वाले ही आज कुदरत के रखवाले बनने का ढोंग रच रहे हैं। सच तो यह है कि हमने पर्यावरण को सिर्फ एक 'इवेंट' बना दिया है, जबकि यह हमारे वजूद का सवाल था। कड़वा सच यह है कि दुनिया भर में हर साल करीब 400 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से आधे से ज्यादा सिंगल यूज प्लास्टिक है। हम उसी प्लास्टिक की बोतलों में बंद पानी पीकर पर्यावरण बचाने की कसमें खा रहे हैं। यह पाखंड नहीं तो और क्या है?
विकास की अंधी दौड़ में हमने जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए। नदियों को गंदे नालों में तब्दील कर दिया। पहाड़ों का सीना चीरकर वहां आलीशान रिसॉर्ट्स बना दिए। जब यही कुदरत कभी तबाही बनकर बरसती है, तो हम इसे 'प्राकृतिक आपदा' कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
यह आपदा प्राकृतिक नहीं है, यह इंसानी लालच का सीधा नतीजा है। हम इतने क्रूर और मूर्ख हो चुके हैं कि जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को कुल्हाड़ी से काट रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट किए जा रहे हैं। पेड़ों की यह अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट का जाल ही कारण है कि आज हमारे शहरों का तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस को छूने लगा है। हम एयर कंडीशनर चलाकर कमरे को तो ठंडा कर लेते हैं, लेकिन उसी एसी के पीछे से निकलने वाली गर्म हवा पूरी पृथ्वी को झुलसा रही है। ये मौसम नहीं, झुलसते शहरों की चीख है।
आज हमारी मानसिकता 'इस्तेमाल करो और फेंको' की हो चुकी है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक आलीशान बैंक बैलेंस तो दे रहे हैं, लेकिन साथ में फेफड़े खराब करने वाली हवा और जहरीला पानी भी वसीयत में छोड़कर जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े गवाही देते हैं कि दुनिया की 99% आबादी ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर है, जो उनकी सेहत के मानकों के खिलाफ है। वायु प्रदूषण के कारण हर साल दुनिया भर में लाखों लोग समय से पहले मौत के मुंह में समा जाते हैं। वैज्ञानिक चेतावनियों के बावजूद पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। अगर यह 1.5°C की सीमा को पार कर गया, तो ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र के जलस्तर का बढ़ना हमारे कई तटीय शहरों को हमेशा के लिए नक्शे से मिटा देगा।
भूजल का स्तर पाताल में जा चुका है, क्योंकि हमने तालाबों को पाटकर उन पर मॉल बना लिए हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि भारत के कई बड़े शहरों में ग्राउंड वाटर का स्तर शून्य के करीब पहुंच रहा है। हम भूल गए कि प्रकृति हमारे बिना रह सकती है, लेकिन हम प्रकृति के बिना एक पल भी सांस नहीं ले सकते। अब भाषण नहीं, कड़े फैसलों की जरूरत है। तस्वीरें खिंचाने और स्टेटस लगाने का वक्त खत्म हो चुका है। कुदरत की अदालत में अब सुनवाई की गुंजाइश नहीं बची, उसने अपना फैसला सुनाना शुरू कर दिया है। भयंकर गर्मी, बिन मौसम बरसात और पिघलते ग्लेशियर इसके सीधे सबूत हैं।
अगर वाकई पर्यावरण को बचाना है, तो अपनी जीवनशैली को बदलना होगा। अपनी सुख-सुविधाओं में थोड़ी कटौती करनी होगी। सरकार की नीतियों को कागजों से निकालकर जमीन पर लाना होगा और उद्योगों के मुनाफे से ज्यादा जरूरी इंसानी सांसों को समझना होगा।
अगली बार जब आप कोई पेड़ काटें या सड़क पर कचरा फेंकें, तो याद रखिएगा कि आप किसी और का नहीं, अपने ही बच्चों के हिस्से की ऑक्सीजन छीन रहे हैं। कुदरत बहुत सब्र वाली है, लेकिन जब उसका सब्र टूटता है, तो वीआईपी हो या आम आदमी, वह किसी को वीटो पावर नहीं देती है।
