कंक्रीट के जंगलों में गुम होती एक 'चीं-चीं'

सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA
आगामी 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस है। विडंबना देखिए, जिस पक्षी ने इंसान को सबसे पहले 'पड़ोसी' माना था। आज उसी की याद दिलाने के लिए हमें कैलेंडर में एक तारीख मुकर्रर करनी पड़ रही है। यह सिर्फ एक नन्हीं चिड़िया के लुप्त होने की कहानी नहीं है। यह हमारी उस 'तरक्की' का काला सच है, जिसने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ अपना बुनियादी रिश्ता ही तोड़ लिया है।
विकास के शोर में हमारे आंगन खामोश होते जा रहे हैं। हम स्मार्ट सिटी और गगनचुंबी इमारतों के सपनों में इतने मशगूल हो गए हैं कि हमने अपने आंगन के उस 'नन्हे मेहमान' का घर ही उजाड़ दिया।
गौरैया कोई विदेशी पक्षी नहीं है, वह हमारे घर की सदस्य थी। वह हमारे अनाज के दानों पर हक जताती थी। बदले में हमें वह चहचहाहट देती थी, जो आज किसी भी महंगे 'म्यूजिक सिस्टम' में नहीं मिलती। गौरैया का गायब होना इस बात का संकेत है कि हमारा वातावरण 'जहरीला' हो रहा है। मोबाइल टावरों का रेडिएशन और कंक्रीट के बंद मकान सिर्फ उसके लिए नहीं, हमारे लिए भी खतरनाक हैं।
सोचिए, आखिरी बार आपने कब किसी गौरैया को अपने हाथ से दाना खिलाया था? हमने अपने घरों को 'शो-केस' तो बना लिया। लेकिन, मिट्टी की वह सोंधी महक और छप्परों की वह दरारें खत्म कर दीं, जहाँ गौरैया अपना घोंसला बनाती थी। हमने उसे 'बेघर' किया।अब हम अपनी बालकनी में प्लास्टिक के फूल लगाकर खुश हो रहे हैं।
प्रकृति का नियम स्पष्ट है, जो दूसरों के घर उजाड़ता है। उसका अपना 'अस्तित्व' भी कभी सुरक्षित नहीं रह सकता। जब हम अपनी छतों पर एक कटोरा पानी रखने का वक्त नहीं निकाल पाते, तब हम खुद को 'सभ्य' कहने का हक खो देते हैं। असली विकास वह नहीं जो आसमान को छू ले, बल्कि वह है जो जमीन पर रहने वाले सबसे छोटे जीव के साथ सह-अस्तित्व बना सके।
गौरैया को बचाना कोई सरकारी प्रोजेक्ट नहीं होना चाहिए। यह एक 'व्यक्तिगत अभियान' होना चाहिए।
अपनी छत या बालकनी पर मिट्टी के सकोरे में पानी और दाना रखने की आदत डालनी होगी। यह सिर्फ दान नहीं, उस कर्ज की अदायगी है जो हम पर प्रकृति का है। अगर आपके घर में प्राकृतिक जगह नहीं है, तो लकड़ी या गत्ते के कृत्रिम घोंसले लगाएं। अपने बगीचों में रसायनों का प्रयोग कम करें। गौरैया के बच्चों का मुख्य भोजन वे छोटे कीड़े हैं, जिन्हें हम जहर डालकर खत्म कर रहे हैं।
स्टेटस ऑफ इंडियाज बर्ड्स भी इस बात की तस्दीक करती है कि आधुनिक चकाचौंध वाले महानगर गौरैया के लिए 'मौत के कुएं' साबित हो रहे हैं। जबकि ग्रामीण आंचल ने आज भी इस नन्हीं जान को पनाह दे रखी है।
गौरैया का गायब होना एक चेतावनी है। अगर आज हमने उस छोटी सी 'चीं-चीं' को अनसुना कर दिया, तो आने वाली पीढ़ियों को हम सिर्फ कंक्रीट के ढेर और मोबाइल की स्क्रीन ही विरासत में दे पाएंगे। इसमें सबसे बड़ा हथियार 'संवेदना' है। अगर आपके भीतर की संवेदना अभी मरी नहीं है, तो आज एक प्याला पानी अपनी छत पर जरूर रखिएगा। गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, हमारे बचपन की वह आखिरी निशानी है। जो हमें इंसान बनाए रखती है।
