एक तपस्वी वैज्ञानिक और व्यवस्था की बेरुखी

"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार"
कुछ दिनों से मन बेहद अशांत है। जब भी दिल्ली के जंतर-मंतर की तरफ निगाह जाती है, तो दिल कचोटने लगता है। और 18 जुलाई की सुबह तो जैसे लोकतंत्र के एक और संवेदनशील पन्ने पर स्याही बिखर गई।
पिछले 21 दिनों से लद्दाख का एक निश्छल और तपस्वी वैज्ञानिक सोनम वांगचुक, दिल्ली की उमस भरी हवाओं में सिर्फ पानी और नमक के सहारे अपने जीवन की आहुति दे रहा था। कल रात तक उनके शरीर का 20 फीसदी हिस्सा इस व्यवस्था की बेरुखी की भेंट चढ़ चुका था। और आज सुबह क्या हुआ? दिल्ली पुलिस और प्रशासन ने ‘सहानुभूति’ का एक ऐसा मुखौटा पहना, जिसके पीछे का दमन साफ नजर आता है। उन्हें जंतर-मंतर के मंच से उठाकर सफदरजंग अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में दाखिल करा दिया गया।
डॉक्टर कह रहे हैं, ‘हालत कमजोर है, लेकिन स्थिर है।’ पर मेरा मन पूछता है, क्या हमारी सामूहिक चेतना भी इस समय स्थिर है, या वह पूरी तरह मर चुकी है?
सोनम वांगचुक कोई साधारण आंदोलनकारी नहीं हैं। वे उस परंपरा के संवाहक हैं, जहां विज्ञान और अध्यात्म का मिलन होता है। लेकिन जब उन्होंने लद्दाख के पहाड़ों और आदिवासियों की रक्षा (छठी अनुसूची) के साथ-साथ NEET पेपर लीक और बदहाल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा दिए, तो हुक्मरानों को लगने लगा कि यह आवाज अब बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते ही व्यवस्था ने अपनी चिर-परिचित क्रूरता दिखा दी।
हम अक्सर आधुनिकता के नैरेटिव में इतने अंधे हो जाते हैं कि हमें जमीन की पुकार सुनाई नहीं देती। वांगचुक का अनशन सिर्फ पर्यावरण को बचाने का अनुष्ठान नहीं था, वह इस देश की लोकतांत्रिक मर्यादाओं को बचाने की आखिरी गुहार थी।
मैं अक्सर सोचता हूं कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि वह संवाद की भाषा भूल गई है?
लद्दाख के ग्लेशियर सिर्फ भूगोल नहीं हैं, वे हमारी सभ्यताओं की जीवनरेखा हैं। यदि वे उद्योगपतियों के लालच की भेंट चढ़ गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। देश का युवा जब पेपर लीक से हताश था, तब लद्दाख के इस बेटे ने उनके दर्द को अपनी भूख बना लिया। क्या युवाओं के हक में आवाज उठाना राजद्रोह की श्रेणी में आता है? सफदरजंग अस्पताल के उस बेड के चारों तरफ जो पहरा है, वह वांगचुक की सुरक्षा के लिए नहीं है, वह दरअसल सत्ता के उस डर का प्रतीक है, जो एक कमजोर होते शरीर की आत्मिक शक्ति से डरती है।
यह समय किसी राजनीतिक दल पर कीचड़ उछालने का नहीं है। यह समय पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का है। जब कड़ाके की ठंड और तपती गर्मी में एक देशभक्त वैज्ञानिक को अपनी बात मनवाने के लिए 21 दिनों तक घुट-घुट कर मरना पड़े, तो समझ लीजिए कि हमारे गणराज्य के स्तंभों में दीमक लग चुकी है।
"इतिहास गवाह है, जब-जब सत्ताओं ने सत्य की आवाज को अस्पतालों के कमरों या जेल की सलाखों में कैद करने की कोशिश की है, वह आवाज और अधिक मुखर होकर पूरे देश में गूंजी है।
सोनम वांगचुक को अस्पताल के बेड पर लिटाकर शायद सरकार ने जंतर-मंतर खाली करा लिया हो, लेकिन करोड़ों युवाओं और देशप्रेमियों के दिलों में जो सुलगता हुआ सवाल छोड़ दिया है, उसका जवाब दिल्ली को आज नहीं तो कल देना ही होगा।"
