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एथलेटिक्स: उठो, दौड़ो... क्योंकि रुकना ही असली हार है

7 May 2026

AI News Reader

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एथलेटिक्स: उठो, दौड़ो... क्योंकि रुकना ही असली हार है

7 मई
विश्व एथलेटिक्स दिवस

एथलेटिक्स: उठो, दौड़ो... क्योंकि रुकना ही असली हार है

सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार

मैदान पर दौड़ता हुआ खिलाड़ी सिर्फ मेडल के लिए नहीं भागता, वह अपनी सीमाओं को पीछे छोड़ने के लिए भागता है। 7 मई कोे 'विश्व एथलेटिक्स दिवस' है। लेकिन क्या हम इसे सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख मानकर भूल जाएंगे? एथलेटिक्स महज एक खेल नहीं है। यह मनुष्य की आदिम जिजीविषा का उत्सव है। यह उत्सव है, उस फेफड़े का जो फटने की कगार पर होकर भी रुकता नहीं है। उस पैर का, जो छाले होने के बाद भी थकते नहीं हैं। उस संकल्प का, जो 'स्टॉपवॉच' की सुइयों को चुनौती देता है।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय एथलेटिक्स ने उस मिथक को तोड़ा है कि हम सिर्फ भीड़ का हिस्सा हैं। जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए, ये केवल नंबर नहीं, बदलते भारत की पदचाप हैं। नीरज चोपड़ा का जादू याद है। टोक्यो में 87.58 मीटर का वह थ्रो सिर्फ भाला नहीं था, वह दशकों की हीनभावना का अंत था। आज भारत वर्ल्ड एथलेटिक्स रैंकिंग में जेवलिन थ्रो में शीर्ष देशों में गिना जाता है।
2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में राष्ट्रीय स्तर के एथलेटिक्स पंजीकरण में 35% की बढ़ोतरी देखी गई है। अब छोटे शहरों से आने वाले एथलीट्स की संख्या कुल एथलीट्स का 60% से अधिक है।
हांगझू एशियाई खेलों में भारत ने एथलेटिक्स में 6 गोल्ड समेत 29 पदक जीते। यह 1951 के बाद हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

हम अक्सर बजट का रोना रोते हैं। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल धन की नहीं, मानसिकता की है। मैदान गीला है या सिंथेटिक ट्रैक पुराना, यह बहाना वो बनाते हैं जिन्हें हारने का डर होता है। जिसे जीतना होता है, वह नंगे पैर भी इतिहास रच देता है।
भारत ने पिछले 5 वर्षों में खेल बजट में करीब 300% की वृद्धि की है, लेकिन क्या यह पैसा जमीनी स्तर के कोचों और स्कूलों तक पहुंच रहा है? एथलेटिक्स में एक सेकेंड का सौवां हिस्सा हार और जीत के बीच की दीवार होता है। इस बारीक अंतर को पाटने के लिए हमें तकनीक और तपस्या का मेल चाहिए। हालांकि चुनौतियां अभी बाकी हैं।

विश्व स्तर पर अगर हम जमैका या अमेरिका से तुलना करें, तो हम अभी भी 'स्पीड' के मामले में पीछे हैं। 100 मीटर की फर्राटा दौड़ में हमारा नेशनल रिकॉर्ड 10.23 सेकेंड मणिकांत होबलिधर के नाम दर्ज है, जबकि विश्व रिकॉर्ड 9.58 सेकंड उसेन बोल्ट पर थमा है। यह 0.65 सेकंड का फासला ही वह "तिलिस्म" है, जिसे हमें भेदना है।

विश्व एथलेटिक्स दिवस पर शपथ पदक की नहीं, पसीने की होनी चाहिए। याद रखिए, ट्रैक पर दौड़ने वाला हर युवा नशीली दवाओं और अवसाद के खिलाफ एक सिपाही है। जिस दिन भारत के हर जिले में एक 'स्टेडियम' नहीं, बल्कि एक 'स्पोर्ट्स कल्चर' होगा, उस दिन ओलंपिक की मेडल टैली में हमें खोजना नहीं पड़ेगा। उठिए, दौड़िए... क्योंकि रुकना ही असली हार है।