बंगाल चुनाव: खेला खत्म, अब 'हिसाब' बाकी

सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA
बंगाल के मतदाता ने इस बार ईवीएम का बटन नहीं दबाया है, उसने व्यवस्था की छाती पर मुक्का मारा है। जब किसी राज्य में 90 लाख फर्जी नाम हटा दिए जाएं और फिर भी 93% वोटिंग हो, तो समझ लीजिए कि जनता अब आर-पार के मूड में है। एग्जिट पोल 145-145 की रट लगा रहे हैं, लेकिन जमीन पर सन्नाटा कुछ और ही कह रहा है। यह सन्नाटा 'परिवर्तन' की आहट भी हो सकता है और 'प्रतिशोध' की ज्वाला भी। दूसरे चरण का मतदान खत्म होते ही जो आंकड़ा सामने आया है, वह केवल एक नंबर नहीं, बल्कि दिल्ली से कोलकाता तक के राजनीतिक गलियारों में उठी एक 'सुनामी' है। 92.9% मतदान! यह महज वोटिंग नहीं है, यह बंगाल के उस 'भद्रलोक' और 'मजदूर' की चीख है, जो या तो व्यवस्था को पूरी तरह बदल देना चाहता है या फिर उसे बचाने के लिए आखिरी दम तक लड़ रहा है।
आजादी के बाद बंगाल ने ऐसा जनसैलाब कभी नहीं देखा। जब 100 में से 93 लोग घर से निकलकर बूथ तक पहुंच जाएं, तो समझ लीजिए कि जनता के मन में कुछ बड़ा पक रहा है। पूर्व बर्धमान ने 93.6% के साथ रिकॉर्ड तोड़ दिया। वहीं, वोटिंग के दिन अक्सर सोने वाला कोलकाता शहर ने भी 88.4% के आंकड़े से सबको चौंका दिया। यह 'बम्पर वोटिंग' अक्सर सत्ता के खिलाफ गुस्से की पहचान होती है, लेकिन बंगाल के इस अजीबो-गरीब मिजाज में यह 'दीदी' के प्रति वफादारी का कवच भी हो सकता है।
इस चुनाव की असली पटकथा महिलाओं ने लिखी है। 93.2% महिला मतदान,पुरुषों से भी ज्यादा है। यह 'लक्ष्मी भंडार' की कृतज्ञता है या संदेशखाली जैसे घावों की टीस? दीदी को भरोसा है कि उनकी 'बहनें' उन्हें डूबने नहीं देंगी। भाजपा को उम्मीद है कि यही खामोश वोटर इस बार 'चुपचाप कमल छाप' का मंत्र सिद्ध करेगा। बंगाल की महिला ने इस बार बूथ पर जाकर साबित कर दिया कि वह सिर्फ घर की 'लक्ष्मी' नहीं, लोकतंत्र की 'किस्मत' भी है।
चुनाव आयोग ने इसे 'चुनावी पर्व' कहा, लेकिन शांति की दावों के बीच चोपड़ा, शांतिपुर और भानगढ़ से आती हिंसा की खबरें बता रही हैं कि बंगाल में 'सिस्टम' का रंग नहीं बदला। बमों की गूंज और बूथ कैप्चरिंग के आरोपों के बीच यह मतदान हुआ है। मुख्यमंत्री खुद धांधली के आरोप लगा रही हैं और विपक्ष लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है। हकीकत यह है कि झंडे बदले हैं, लेकिन डंडा और लठैत वही पुराने हैं।
एग्जिट पोल्स ने कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। कोई भाजपा को बहुमत दे रहा है, तो कोई ममता की वापसी का दावा कर रहा है। लेकिन 4 मई को जब बक्से खुलेंगे, तो सवाल सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी का नहीं होगा। सवाल यह होगा कि क्या 90 लाख फर्जी नामों की छंटनी के बाद हुआ यह 'शुद्ध' मतदान बंगाल को नई दिशा देगा?
ईवीएम में 294 सीटों की तकदीर बंद है। 93% की इस भीड़ ने नेताओं की नींद उड़ा दी है। यह भीड़ अगर 'बदलाव' के लिए निकली है, तो दीदी के 10 साल के साम्राज्य की नींव हिल चुकी है। और अगर यह भीड़ 'बचाव' के लिए निकली है, तो दिल्ली के 'दादाओं' के लिए बंगाल अभी भी एक अधूरा ख्वाब ही रहेगा।
अब अंतिम बात। सत्ता की मलाई खाने वाले कल फिर नए चेहरों के साथ नजर आएंगे, लेकिन सवाल उस 93% जनता का है, जिसने इस उम्मीद में अंगूठा घिसा है कि शायद इस बार चुनाव के बाद सड़कों पर खून नहीं, विकास की स्याही गिरेगी।
