रक्तदान सिर्फ दान नहीं, सामाजिक दायित्व की परीक्षा

रक्तदान सिर्फ दान नहीं, सामाजिक दायित्व की परीक्षा
सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
अक्सर हम समाज में बड़े बदलावों की बात करते हैं। बड़े मंचों से भाषण देते हैं और व्यवस्था को कोसते हैं। लेकिन, जब बारी आती है उस एक छोटे से 'संवेदनात्मक कदम' की, जो बिना किसी सरकारी मदद के समाज को जोड़ सकता है, तो हम ठिठक जाते हैं। 14 जून को 'विश्व रक्तदाता दिवस' है। यह दिन हमें आईना दिखाने के लिए पर्याप्त है कि हम एक समाज के रूप में एक-दूसरे के प्रति कितने जागरूक हैं?
तथ्य यह है कि विज्ञान ने आज मंगल तक की यात्रा सुगम बना ली है। लेकिन, आज भी चिकित्सा विज्ञान के पास रक्त का कोई कृत्रिम विकल्प नहीं है। आप कितनी भी आधुनिक मशीनें ले आएं, कितना भी बड़ा अस्पताल बना लें, लेकिन अगर रज्जो की नस में दौड़ता रक्त समय पर न मिला, तो सारा विज्ञान फेल है।
क्या यह विडंबना नहीं है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में, जहां 'वसुधैव कुटुंबकम' का उद्घोष होता है, वहां आज भी हम रक्त के अभाव में अपनों को खो देते हैं? हम भीड़ का हिस्सा तो हैं, लेकिन क्या हम उस भीड़ का हिस्सा हैं जो जरूरत पड़ने पर अपना हाथ आगे बढ़ा सके?
रक्तदान करना केवल दानवीर बनने का प्रदर्शन नहीं है, यह एक 'नागरिक कर्तव्य' है। भारत में हर साल लगभग 1.5 करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, लेकिन आपूर्ति उस अनुपात में नहीं है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है, यह उन परिवारों का दर्द है, जो अस्पतालों की चौखटों पर खून के एक बैग के लिए गिड़गिड़ाते हैं।
जब आप रक्तदान करते हैं, तो आप केवल एक यूनिट रक्त नहीं दे रहे होते, आप एक व्यवस्था का हिस्सा बन रहे होते हैं। आप यह संदेश दे रहे होते हैं कि 'मेरी रगों में दौड़ता यह लाल रंग, केवल मेरा नहीं है।' यह संवेदनशीलता ही एक सभ्य समाज की नींव है।
"आज के दिन हमें खुद से पूछना चाहिए, क्या हमारा समाज इतना सक्षम हो गया है कि बिना किसी सिफारिश के हर गरीब को रक्त मिल सके? जब तक रक्त के लिए 'जुगाड़' की जरूरत है, तब तक हम एक समाज के रूप में अपूर्ण हैं।
रक्तदाता दिवस का असली उत्सव तब होगा, जिस दिन रक्तदान किसी कैंप का मोहताज न रहे, बल्कि यह हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन जाए। जिस दिन अस्पताल के स्टोर रूम में रक्त का स्टॉक 'पर्याप्त' हो, उसी दिन समझिएगा कि हमने मानवता की परीक्षा पास कर ली है।"
रक्त का कोई धर्म नहीं होता। कोई राजनीति नहीं होती। और न ही कोई भूगोल होता है। यह सिर्फ जीवन की निरंतरता है। तो क्या आज हम इस संकल्प के साथ आगे बढ़ेंगे कि हम न केवल जागरूक नागरिक बनेंगे, बल्कि एक ऐसे 'ब्लड डोनर नेटवर्क' का हिस्सा बनेंगे, जहां कोई हाथ खाली न रहे?
याद रखिए, समाज को बदलने की शुरुआत सत्ता के गलियारों से नहीं, आपके और मेरे जैसे लोगों की शिराओं से होती है।
(लेखक अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण से जुड़े रहे हैं।)
