आइए फिर से थामें सेहत का हैंडल

विश्व साइकिल दिवस विशेष
आइए फिर से थामें सेहत का हैंडल
सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
वह भी क्या दौर था, जब घर के आंगन में खड़ी साइकिल सिर्फ एक सवारी नहीं, बल्कि परिवार की संपन्नता और प्रतिष्ठा का प्रतीक हुआ करती थी। पिता की पुरानी एटलस या हीरो पर बैठकर ककरहिया सीखने से लेकर, कैंची और फिर गद्दी पर बैठकर पैडल मारने का वह रोमांच... याद कीजिए, हम सभी की कई पीढ़ी इसी कशमकश में बड़ी हुई है। साइकिल की चैन उतरने पर हाथ काले करना और फिर उसी शान से उसे वापस चढ़ा लेना, हमारे बचपन का पहला 'मैकेनिकल इंजीनियरिंग' का पाठ था। आज जब दुनिया 3 जून को 'विश्व साइकिल दिवस' मना रही है, तो दिल के किसी कोने में एक कसक सी उठती है। विकास की अंधी दौड़ में हमने रफ्तार तो पा ली, लेकिन उस रफ्तार की कीमत हम अपनी सेहत और पर्यावरण को दांव पर लगाकर चुका रहे हैं।
मौजूदा वक्त में हमारे पास चमचमाती कारें हैं। रफ्तार से भागती बाइकें हैं। लेकिन, क्या सचमुच हम कहीं पहुंच रहे हैं? सुबह और शाम के वक्त महानगरों की सड़कों पर रेंगते ट्रैफिक को देखिए। हम अपनी ही बनाई मशीनों के धुएं में घुट रहे हैं। जिस साइकिल ने कभी हमें आजादी का अहसास कराया था। उसे हमने 'पिछड़ेपन' का ठप्पा लगाकर गैराज के किसी अंधेरे कोने में धकेल दिया।
सोचने वाली बात यह है कि जो साइकिल कभी आम आदमी की हमसफर थी, आज वह रईसों के जिम और महंगे साइकिलिंग क्लबों की 'लक्जरी' बनकर रह गई है। सेहत पाने के लिए हम हजारों रुपये खर्च करके जिम में स्थिर साइकिल के पैडल मार रहे हैं। लेकिन, खुली हवा में सड़क पर निकलने से कतराते हैं।
यह सिर्फ पुरानी यादों का भावुक विलाप नहीं है, बल्कि इसके पीछे विज्ञान और अर्थशास्त्र के वो कड़वे आंकड़े हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज कर रहे हैं। ग्लासगो यूनिवर्सिटी का शोध कहता है कि रोज साइकिल चलाने से दिल की बीमारी और कैंसर का खतरा करीब 45% कम हो जाता है। वहीं, ऑक्सफोर्ड के पर्यावरणविद मानते हैं कि रोज का एक छोटा सफर कार की जगह साइकिल से तय करने पर शहरों का कार्बन उत्सर्जन 67% तक घट सकता है। नीदरलैंड्स जैसे देश साइकिल को अपनाकर अपने स्वास्थ्य बजट में सालाना अपनी जीडीपी का 3% बचा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर भारत में डब्ल्यूएचओ के मुताबिक शारीरिक निष्क्रियता के कारण डायबिटीज और बीपी महामारी बन रहे हैं। जरा सोचिए, मध्यम वर्ग की कमाई का जो एक बड़ा हिस्सा आज जिम की फीस, पेट्रोल और दवाओं की भेंट चढ़ रहा है, उसका सीधा और मुफ्त इलाज हमारी साइकिल के पैडल में छिपा है।
याद रखिये, साइकिल सिर्फ दो पहियों का ढांचा नहीं है, यह एक मुकम्मल जीवन-दर्शन है। आज के दौर में इसकी प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। लाइफस्टाइल से जुड़ी बीपी, शुगर, मोटापा बीमारियों के इस दौर में साइकिल से बेहतर और कोई कार्डियो एक्सरसाइज नहीं है। यह बिना किसी अतिरिक्त खर्च के आपके दिल और फेफड़ों को दुरुस्त रखती है।
कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग के इस समय में साइकिल ही एकमात्र ऐसा साधन है, जो पर्यावरण से कुछ नहीं लेती, बल्कि हमारी सांसों को शुद्ध रखने में मदद करती है।
पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों के बीच, यह एक ऐसा वाहन है, जिसका 'माइलेज' सिर्फ आपकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
हर साल 3 जून को तस्वीरें खिंचवाने, साइकिल रैलियां निकालने और सोशल मीडिया पर 'गो ग्रीन' के नारे लगाने से स्थितियां नहीं बदलेंगी। बदलाव तब आएगा, जब हमारे नीति-नियंता और शहर नियोजक सड़कों पर साइकिल चालकों के हक को पहचानेंगे।
आज हमारे शहरों की सड़कें साइकिल चलाने वालों के लिए बेहद असुरक्षित हो चुकी हैं। जब तक शहरों में समर्पित 'साइकिल ट्रैक' नहीं बनेंगे। दफ्तरों और सार्वजनिक स्थानों पर साइकिल पार्किंग की सुरक्षित व्यवस्था नहीं होगी। तब तक मिडिल क्लास इसे अपनाने से हिचकिचाएगा। हमें साइकिल को 'गरीब की मजबूरी' के चश्मे से देखना बंद करके 'बुद्धिमान की पसंद' के रूप में स्वीकार करना होगा।
आइए, इस विश्व साइकिल दिवस पर सिर्फ औपचारिकता न निभाएं। अपने बच्चों को वीडियो गेम और स्क्रीन की आभासी दुनिया से बाहर निकालें। उन्हें साइकिल की घंटी की वह 'ट्रिन-ट्रिन' सुनाएं, जो कभी हमारे मोहल्लों की सबसे प्यारी धुन हुआ करती थी।
दुकान से दूध-ब्रेड लाना हो या पास के पार्क तक जाना, हफ्ते में कम से कम दो दिन कारों की चाबी को आराम दीजिए और साइकिल के पैडल पर पैर रखिए। यकीन मानिए, जब पहिया घूमेगा, तो न सिर्फ आपकी सेहत वापस लौटेगी, बल्कि यह धरती भी थोड़ा खुलकर सांस ले सकेगी।
शुरुआत खुद से कीजिए, क्योंकि बदलाव का पैडल हमेशा पहला कदम बढ़ाने से ही घूमता है।
