खामोशी का शोर और हमारा बहरापन

खामोशी का शोर और हमारा बहरापन
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर विशेष
सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA
दुनिया आज नीली रोशनी में नहाएगी। इमारतें नीली होंगी, सोशल मीडिया पर 'ब्लू' फिल्टर लगेंगे और 'ऑटिज्म' शब्द पर बड़े-बड़े भाषण होंगे। लेकिन क्या हम उस खामोशी को सुन पाएंगे?जो एक ऑटिस्टिक बच्चे की आँखों में तैरती है? या हम सिर्फ अपनी 'नॉर्मल' होने की ऐंठ में इतने अंधे हो चुके हैं कि हमें विविधता सिर्फ किताबों में अच्छी लगती है?
हमने एक पैमाना बना लिया है। जो हमारी तरह बोलता है। हमारी तरह हाथ मिलाता है। हमारी तरह भीड़ का हिस्सा बनता है। वही 'सामान्य' है। जो बच्चा भीड़ से डरता है। जो शोर से सहम जाता है या जो अपनी ही दुनिया के गणित में उलझा है, उसे हम 'बीमार' या 'असामान्य' का टैग दे देते हैं।
त्रासदी यह नहीं है कि उसे ऑटिज्म है। त्रासदी यह है कि समाज के पास उसे समझने का दिल नहीं है। हम उसे सुधारना चाहते हैं, जबकि जरूरत हमें खुद को सुधारने की है। ऑटिज्म कोई अभिशाप नहीं है, यह तो कुदरत का एक अलग रंग है। एक ऐसी वायरिंग, जो हमसे अलग है। वे बच्चे झूठ नहीं बोल पाते, वे छल-कपट की दुनिया से कोसों दूर हैं।
वे उस आदिम ईमानदारी को जी रहे हैं, जिसे हम 'सभ्य' लोग कब का मार चुके हैं। हम उन्हें 'सोशल' बनाना चाहते हैं, जबकि हम खुद इतने सोशल हो चुके हैं कि पड़ोस के घर में लगी आग भी हमें तब तक नहीं दिखती, जब तक वह हमारे दरवाजे तक न आ जाए। ऑटिज्म से जूझ रहे परिवारों का संघर्ष देखिए, वे हर दिन 'असंभव के खिलाफ' लड़ते हैं। एक ऐसी दुनिया के खिलाफ, जो सिर्फ रफ़्तार और चालाकी को पूजती है।
जागरूकता का मतलब सिर्फ एक दिन का 'इवेंट' नहीं होता। जागरूकता का मतलब है उस मां के दर्द को समझना, जिसके बच्चे को स्कूल में दाखिला नहीं मिलता। उस पिता के साथ खड़े होना, जिसे समाज की चुभती नजरें घायल करती हैं। हम उन्हें 'स्पेशल' कहते हैं, लेकिन व्यवहार 'एक्स्ट्रा' बोझ जैसा करते हैं। असली विकलांगता ऑटिज्म नहीं है, असली विकलांगता हमारी संवेदनाओं का मर जाना है।
अगर आप किसी बच्चे को खिलौने के साथ घंटों अकेले खेलते देख उसे 'अजीब' कह रहे हैं, तो यकीन मानिए—अजीब आप हैं, वह बच्चा तो सिर्फ अपनी एकाग्रता के चरम पर है।
नीली लाइटें बुझ जाएंगी, परदा गिर जाएगा। कल फिर वही रैट-रेस शुरू होगी। सवाल यह है कि क्या हम उन बच्चों के लिए एक ऐसी जगह बना पाएंगे जहां उन्हें अपनी खामोशी से डर न लगे? ऑटिज्म जागरूकता दिवस तभी सफल है, जब हम 'सहानुभूति' छोड़कर 'समानुभूति' अपनाएं। उन्हें ठीक करने की कोशिश छोड़िए, पहले खुद के नजरिए का इलाज कीजिए।
क्या आप तैयार हैं, उस दुनिया को स्वीकार करने के लिए, जो आपकी परिभाषाओं में फिट नहीं बैठती?
