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पितृ पक्ष 2024: ये दो दिव्य पुरुष जो पितरों तक पहुंचाते हैं अर्पित भोजन!

पितृपक्ष के दौरान यह मान्यता है कि पितर किसी न किसी रूप में धरती पर मौजूद रहते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध, तर्पण और अन्न-जल के अर्पण से तृप्त होते हैं। लेकिन कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या वास्तव में पितरों तक यह अर्पित भोजन पहुंचता है और अगर हां, तो इसे पितरों तक कौन पहुंचाता है?

देहरादून: पितृपक्ष के दौरान पितरों को भोजन और जल अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, और इसे हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्व दिया जाता है। इस दौरान यह माना जाता है कि पितर धरती पर किसी न किसी रूप में मौजूद होते हैं और उनके लिए किया गया श्राद्ध कर्म उन्हें तृप्ति प्रदान करता है।

पितर कैसे भोजन ग्रहण करते हैं?

हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार, पितर अपने सूक्ष्म शरीर से अर्पित भोजन का सारतत्व, यानी उसकी गंध और रस को ग्रहण करते हैं। पितरों का शरीर भौतिक नहीं होता, इसलिए वे भोजन के भौतिक रूप को नहीं, बल्कि उसके सूक्ष्म रूप को ग्रहण करते हैं। कौवे को पितरों का प्रतीक माना जाता है, और श्राद्ध के दौरान उसे भोजन कराना इस बात का प्रतीक होता है कि पितर कौवे के रूप में भोजन को ग्रहण कर रहे हैं।

दिव्य पुरुषों की भूमिका

श्राद्ध कर्म और पितृपक्ष की परंपरा में यह विश्वास है कि पितर अदृश्य रूप में धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा अर्पित अन्न-जल का सारतत्व ग्रहण करते हैं। हिन्दू धर्म में कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति पितर के नाम और गोत्र का उच्चारण करते हुए अन्न और जल अर्पित करता है, तो दो दिव्य पुरुष—विश्वदेव और अग्निष्वात—अदृश्य रूप में प्रकट होते हैं। ये दिव्य पुरुष अर्पित किए गए अन्न-जल को पितरों तक पहुंचाते हैं, चाहे पितरों ने किसी भी योनि में पुनर्जन्म लिया हो।

यदि पितर दानव योनि में हों, तो अर्पित किया हुआ भोजन मांस के रूप में उन तक पहुंचता है। प्रेत योनि में जन्मे पितर इसे खून के रूप में ग्रहण करते हैं। पशु योनि में जन्मे पितरों को यह भोजन घास (तृण) के रूप में प्राप्त होता है, जबकि देव योनि में जन्मे पितर इसे अमृत रूप में ग्रहण करते हैं। यह संपूर्ण प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर होती है, इसलिए भौतिक रूप से अर्पित किया हुआ अन्न जस का तस दिखाई देता है, लेकिन पितर उसका सारतत्व ग्रहण कर तृप्त होते हैं।

इस मान्यता के अनुसार, पितरों का शरीर भौतिक नहीं होता, बल्कि सूक्ष्म होता है। इसलिए वे केवल अन्न-जल का रस और गंध ग्रहण कर सकते हैं।

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