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शिकारी ने किया भगवान का ‘शिकार’!

निर्जन वन की शांति में एक शिकारी शिकार की खोज में भटकता फिर रहा था। जब शिकार नहीं मिला तो भूख-प्यास से व्याकुल होकर उसने चारों ओर नजर दौड़ाई। उसे दूर एक छोटी सी कुटिया दिखाई दी, जहाँ से एक शांत और सौम्य स्वर सुनाई पड़ा। शिकारी ने अंदर जाकर देखा—एक वृद्ध संत ध्यानमग्न बैठे थे।

शिकारी ने संत को प्रणाम किया और पूछा, “महाराज, मैं तो वन में शिकार की खोज में आया हूँ, पर आप यहाँ क्यों हैं?” संत ने उत्तर दिया, “मैं अपने सांवले सलोने प्रभु श्रीकृष्ण की खोज में यहाँ तपस्या कर रहा हूँ।”

शिकारी को धर्म-अध्यात्म की कोई समझ नहीं थी। उसकी सोच केवल शिकार तक सीमित थी। वह संत से बोला, “मुझे बताइए आपका शिकार कैसा दिखता है? मैं उसे पकड़कर आपके पास ले आऊँगा!”

संत ने विस्मित होकर उत्तर दिया, “मैं वर्षों से प्रभु की खोज कर रहा हूँ, किंतु मुझे अब तक उनके दर्शन नहीं मिले। तुम कैसे उन्हें पकड़ लोगे?”

शिकारी हठी था। उसने कहा, “बिना आपके शिकार को पकड़े मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा। बस आप इतना बता दें कि वह दिखता कैसा है?”

संत मन ही मन सोचने लगे कि यह व्यक्ति भक्ति से अनजान है। पर उसकी जिद को देखते हुए संत भाव-विभोर होकर बोले, “वह सांवला सलोना है, सिर पर मोर मुकुट धारण किए हुए हैं, हाथों में बांसुरी है, उनकी मधुर मुस्कान मन को मोह लेती है।” इतना कहते-कहते संत की आँखों में अश्रुधारा बहने लगी।

शिकारी ने संत की बात सुनकर वन में एक स्थान पर जाल बिछाया और प्रतीक्षा करने लगा। अब उसका प्रण था कि बिना शिकार मिले वह कुछ नहीं खाएगा। वह हर क्षण संत द्वारा बताए गए श्रीकृष्ण के स्वरूप का ध्यान करता रहा। उसके होंठों पर, मन-मस्तिष्क में हर पल केवल एक ही नाम था—श्याम सुंदर।

तीन दिन और तीन रात बीत गए। शिकारी का ध्यान इतना गहन था कि उसे अपनी भूख-प्यास का कोई भान नहीं था।

और तभी—वन में एक दिव्य प्रकाश फैला। श्रीकृष्ण स्वयं प्रकट हुए और शिकारी के जाल में फंसने का अभिनय करने लगे।

शिकारी ने जब प्रभु को अपने जाल में पाया, तो उसे एक अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई। उसने उन्हें अपने कंधे पर लादकर संत के पास पहुँचा दिया।

संत श्रीकृष्ण के दर्शन कर भाव-विभोर हो गए और श्रद्धा से नतमस्तक होकर बोले, “प्रभु, मैं वर्षों से आपकी आराधना कर रहा हूँ, पर मुझे कभी आपके साक्षात दर्शन नहीं हुए। फिर इस शिकारी को आपने दर्शन क्यों दिए?”

श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले, “यह शिकारी मुझे पहचानता तक नहीं था। उसने मेरे नाम तक कभी नहीं सुना, किंतु उसे तुम पर पूर्ण विश्वास था। उसे यह यकीन था कि जो स्वरूप तुमने उसे बताया, वही मेरा वास्तविक रूप है।” “उसने तीन दिन तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए, पूर्ण तन्मयता से मेरा ध्यान किया। हर क्षण वह मुझे पाने की तड़प में था। उसे तो यह भी नहीं पता था कि वह भक्ति कर रहा है, किंतु उसकी निष्कपट भावना और अनवरत पुकार ने मुझे विवश कर दिया कि मैं स्वयं उसके जाल में आ जाऊँ।”

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