जैसलमेर के तपते रेगिस्तान के बीचों-बीच स्थित है एक ऐसा गाँव, जहाँ सन्नाटा भी चीखता है। कुलधरा—जहाँ १८२५ की एक काली रात को १५०० लोग अचानक गायब हो गए। न कोई पदचिह्न मिले, न किसी ने उन्हें जाते देखा। पीछे छूट गया तो बस एक भयानक श्राप। यह दौर था जैसलमेर के शक्तिशाली पालीवाल ब्राह्मणों का। कुलधरा एक समृद्ध गाँव था, लेकिन यहाँ के लोगों की सुख-शांति पर नज़र पड़ी रियासत के दीवान सालिम सिंह की। सालिम सिंह अपनी क्रूरता और अय्याशी के लिए कुख्यात था।
उसकी नज़र गाँव के प्रधान की सुंदर बेटी पर पड़ी। उसने धमकी दी कि यदि अगले पूर्णमासी तक लड़की उसे नहीं सौंपी गई, तो वह पूरे गाँव पर भारी लगान थोप देगा और कहर बरपाएगा।
पालीवाल ब्राह्मणों के पास दो रास्ते थे: या तो अपनी बेटी का सौदा करें, या अपनी ज़मीन का। उन्होंने तीसरा रास्ता चुना। आधी रात को कुलधरा समेत आसपास के ८४ गाँवों के लोगों ने एक गुप्त सभा की। अपनी मर्यादा बचाने के लिए उन्होंने अपनी सदियों पुरानी विरासत, अपने घर और अपनी मिट्टी को छोड़ने का फैसला किया।
जाते-जाते उन्होंने इस ज़मीन को श्राप दिया:
“आज के बाद इस मिट्टी पर कोई भी दोबारा बस नहीं पाएगा। जो यहाँ रुकेगा, वह मिट जाएगा।”
आज भी कुलधरा के खंडहर उस रात की गवाही देते हैं। कई पैरानॉर्मल एक्सपर्ट्स का दावा है कि यहाँ आज भी लोगों के चलने और बात करने की आवाजें सुनाई देती हैं।
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