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राम को चुनौती! नास्तिक ने जंगल में परखी राम की शक्ति?

संत मलूकदास शुरू में नास्तिक थे। एक दिन, उनके गाँव में एक पहुँचे हुए साधु कुछ दिनों के लिए पधारे। वे साधु बड़े ही विद्वान और ज्ञानी थे। वे प्रतिदिन सुबह-शाम गाँव वालों को एकत्र कर रामायण का पाठ सुनाते और भगवान राम की महिमा का बखान करते।
एक दिन मलूकदास भी वहां पहुंचे। उस समय साधु कह रहे थे —”राम सबसे बड़े दाता हैं। भूखों को अन्न,नंगों को वस्त्र,और बेघर को आश्रय देते हैं।” यह सुनकर मलूकदास मुस्कराए और बोले,”यदि मैं कुछ भी काम न करूं, सिर्फ राम का नाम लूं, तो क्या राम मुझे भोजन देंगे?”
साधु बोले, “निःसंदेह देंगे।”मलूकदास ने फिर पूछा, “अगर मैं किसी घनघोर जंगल में अकेला बैठूं तब भी?”
साधु ने फिर विश्वासपूर्वक उत्तर दिया, “तब भी राम तुम्हें भोजन देंगे।”

यह सुनते ही मलूकदास ने निश्चय किया कि इस बात की सत्यता परखनी चाहिए। वे जंगल की ओर चल पड़े और एक घने पेड़ पर चढ़कर बैठ गए। चारों ओर दूर-दूर तक जंगल फैला था – कांटों की झाड़ियाँ, ऊँचे पेड़ और भयावह सन्नाटा।रात यूँ ही बीत गई। अगले दिन दोपहर के आसपास उन्हें घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई दी। राजकीय अधिकारी किसी शिकार या यात्रा पर निकले थे। उन्होंने पेड़ के नीचे विश्राम किया और एक अधिकारी जैसे ही भोजन निकालने लगा, तभी शेर की गगनभेदी दहाड़ गूंजी। घोड़े बिदककर भागे और भयभीत अधिकारी भी अपना भोजन वहीं छोड़कर जंगल से बाहर भाग गए।
मलूकदास यह सब देख रहे थे। उनके मन में भाव आया —
“राम ने मेरी सुन ली। इस निर्जन वन में मेरे लिए भोजन भेजा है!”परंतु उन्होंने भोजन नहीं किया। विचार किया — “यदि यह सचमुच राम की लीला है, तो अगली कड़ी भी देखनी चाहिए।”कुछ ही समय बाद डाकुओं का एक दल वहां से गुजरा। भोजन को देखकर वे चौंक गए।
सरदार बोला, “वाह! भगवान की लीला देखो, भूखे थे और तैयार भोजन मिल गया!”
लेकिन डाकू स्वभाव से शक्की होते हैं। एक बोला,”यह भोजन ऐसे जंगल में मिलना संदेहास्पद है। इसमें ज़रूर विष होगा।”वे आसपास छानबीन करने लगे और पेड़ पर मलूकदास को देख लिया।सरदार गरजते हुए बोला, “तूने भोजन में ज़हर मिलाया है!”

मलूकदास ने ऊपर से ही शांत स्वर में कहा, “नहीं, यह भोजन भगवान राम की लीला है। इसमें विष नहीं है।”फिर डाकुओं ने उन्हें धमकाया और भोजन करने को मजबूर किया। मलूकदास ने निडर होकर सारा भोजन किया और कुछ ही देर बाद नीचे उतरकर पूरी घटना सुनाई। डाकू स्तब्ध रह गए। सरदार ने मलूकदास से क्षमा मांगी और कहा,
“आज से हम भी रामभक्त हैं। राम का नाम ही सच्चा सहारा है।”गांव लौटकर मलूकदास ने सबसे पहले जो दोहा रचा, वो आज भी जन-जन की ज़ुबान पर है—

“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम,
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।”

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