पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर न केवल भारत के चार धामों में से एक है, बल्कि अपने अनूठे रहस्यों और परंपराओं के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है मंदिर के शिखर पर लहराता दिव्य ध्वज, जो आस्था और आश्चर्य का केंद्र है।
सबसे विस्मयकारी मान्यताओं में से एक यह है कि मंदिर के शीर्ष पर लगा यह विशाल ध्वज सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। यह दृश्य अपने आप में एक कौतूहल का विषय है और भक्तों की आस्था को और दृढ़ करता है।
इससे भी महत्वपूर्ण है इस ध्वज को प्रतिदिन बदलने की सदियों पुरानी परंपरा। यह 20 फीट का त्रिकोणीय ध्वज, जिसे ‘पतितपावन बाना’ भी कहा जाता है, हर शाम सूर्यास्त से पहले बदला जाता है।
इस अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य का निर्वहन चोल परिवार पिछले 800 वर्षों से पूरी निष्ठा और समयबद्धता के साथ कर रहा है। यह एक ऐसी सेवा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। पौराणिक मान्यता इतनी प्रबल है कि यदि किसी भी दिन यह ध्वज नहीं बदला गया, तो मंदिर अगले 18 वर्षों के लिए स्वतः बंद हो जाएगा। यह मान्यता इस परंपरा के महत्व को और भी गहरा कर देती है। इस दैनिक बदलाव के पीछे एक रोचक कथा जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार स्वयं भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में संकेत दिया कि उनका ध्वज पुराना और जीर्ण-शीर्ण हो गया है। जब अगले दिन पुजारियों ने देखा, तो ध्वज वास्तव में पुराना हो चुका था। तभी से, भगवान के आदेश का पालन करते हुए, प्रतिदिन नया ध्वज फहराने की यह परंपरा शुरू हुई।
इसके साथ ही यह भी मान्यता है कि पुराना ध्वज दिन भर की नकारात्मक ऊर्जाओं को अपने में समाहित कर लेता है। इसलिए, उसे हटाकर नए, पवित्र ध्वज को स्थापित किया जाता है, ताकि मंदिर परिसर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहे और बुरी शक्तियाँ दूर रहें।
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