जगन्नाथ पूरी की पवित्र भूमि पर, जहाँ पंडित नित्य प्रसाद सजाते हैं, हथेली में जल बिखेर, देवता की छवि को आमंत्रित करते हैं। जब जल में उनकी परछाई उभर आती है, स्पष्ट और अविकल, तब समझो जगन्नाथ स्वयं आए, भोग लगाने को अकल्पित। यह मान्यता है कि देवता ने स्वीकारा है
जन्माष्टमी के पावन अवसर पर, जब पूर्णा के राजा ने भगवान जगन्नाथ को प्रसाद अर्पित किया, तो उन्हें उनकी परछाई दिखाई नहीं दी। इस अनोखी घटना ने नगर के लोगों को चिंतित कर दिया, और वे सभी ने भगवान के लिए विविध प्रकार के भोजन तैयार किए।
राजा ने दृढ़ निश्चय किया कि वे भी तब तक भोजन नहीं करेंगे जब तक इस रहस्य का पता नहीं चल जाता। अंततः, भगवान जगन्नाथ ने राजा को सपने में दर्शन दिए और उन्हें बताया कि वे एक गरीब भक्त की कुटिया में भोजन करने गए थे। इस घटना के बाद, जब भगवान को फिर से भोग लगाया गया, तो उनकी परछाई स्पष्ट दिखाई देने लगी।
इस घटना ने भक्तों को यह सिखाया कि भगवान की कृपा सभी पर समान रूप से बरसती है, चाहे वह राजा हो या गरीब भक्त। यह घटना आज भी जगन्नाथ पूरी के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है और भक्तों को भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण की प्रेरणा देती है।
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