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निर्जला एकादशी 2024: पंचयोग का अद्भुत संयोग, स्वाति नक्षत्र में व्रत की शुभ घड़ी

देहरादून:ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी के नाम से जाना गया है. इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है. हर एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा का विधान है. एकादशी का व्रत करने और उनकी पूजा-अर्चना करने से श्री हरि अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं. हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी का व्रत बेहद ही शुभ और लाभकारी माना जाता है. इस दिन श्री हरि विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है.सात वर्षों के बाद आने वाले इस विशेष निर्जला एकादशी पर, ज्योतिषीय पंचयोग का दुर्लभ संयोग बन रहा है।

निर्जला एकादशी 2024 तिथि और शुभ मुहूर्त 

निर्जला एकादशी 2024 तिथि और शुभ मुहूर्त (इस वर्ष, निर्जला एकादशी का पवित्र व्रत स्वाति नक्षत्र में मनाया जाएगा, जो व्रतियों के लिए विशेष फलदायी होगा।

  1. ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ- 17 जून को सुबह 4 बजकर 43 मिनट पर.
  2. ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त- 18 जून को सुबह 7 बजकर 28 मिनट पर.
  3. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत 18 जून को रखा जाएगा.
  4. निर्जला एकादशी 2024 पारण का समय- 19 जून को सुबह 5 बजकर 24 मिनट से सुबह 7 बजकर 28 के बीच किया जाएगा.

निर्जला एकादशी शुभ योग

इस साल निर्जला एकादशी पर 3 शुभ योगों का एक साथ निर्माण हो रहा है. इस वजह से इस बार यह तिथि बेहद शुभ होने वाली है. इस दिन त्रिपुष्कर योग, शिव योग और स्वाति नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है.

  • त्रिपुष्कर योग 18 जून दोपहर 3 बजकर 56 मिनट से लेकर 19 जून सुबह 5 बजकर 24 मिनट तक रहेगा.
  • स्वाति नक्षत्र 18 जून भोर से दोपहर 3 बजकर 56 मिनट तक रहेगा.
  • इसके अलावा शिव योग सुबह से लेकर रात 9 बजकर 39 मिनट तक रहेगा.

इस शुभ अवसर पर, दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, घड़े का दान करना चाहिए, जिससे जल की महत्वता का प्रतीकात्मक सम्मान किया जा सके। इस व्रत को रखने से भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि यह उन्हें आत्म-संयम और धैर्य की ओर भी अग्रसर करता है।

महाभारत काल में भीम ने रखा था ये व्रत
स्कंद पुराण में एकादशी महात्म्य नाम का अध्याय है। इसमें सालभर की सभी एकादशियों की जानकारी दी है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशियों का महत्व बताया है। निर्जला एकादशी के बारे में पांडव पुत्र भीम से जुड़ी कथा है। महाभारत काल में भीम ने इस एकादशी का उपवास किया था। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा गया है।

ये व्रत महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए बताया था। तब भीम ने कहा कि पितामाह, आपने एक माह में दो एकादशियों के उपवास की बात कही है। मैं एक दिन तो क्या, एक समय भी खाने के बिना नहीं रह सकता हूं। वेदव्यास ने भीम से कहा कि सिर्फ निर्जला एकादशी ही ऐसी है जो सालभर की सभी एकादशियों का पुण्य दिला सकती है। ये व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर होता है। तब इस दिन भीम ने व्रत किया था।

24 एकादशियों का फल देती है निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी का व्रत गंगा दशहरा के अगले दिन आता है. इस व्रत में सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल भी न पीने का विधान होने के कारण ही इसे निर्जला एकादशी कहा गया है. इस निर्जला व्रत से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने के दोष से मुक्ति मिलती है और सालभर की एकादशियों के पुण्य भी प्राप्त होता है.यह एकादशी बेहद खास इसलिए मानी गई है क्योंकि इस दिन बिल्कुल भी पानी नहीं पिया जाता है. ज्येष्ठ माह में दिन बड़े और भयंकर गर्मी वाले होते हैं, इसलिए प्यास लगती ही है. ऐसे में खुद पर काबू रखकर पानी नहीं पीना, तपस्या करने जैसा माना गया है. इस दिन उपवास करने से धन-धान्य, पुत्र और आरोग्य की प्राप्ति होती है साथ ही लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है.

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