भक्त धन्ना का जन्म 20 अप्रैल 1415 को राजस्थान के टोंक जिले के धुवा गाँव में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता रामेश्वर जाट खेती करते थे और माता गंगा बाई गौ पालन करती थीं। धन्ना बचपन से ही सीधे-सादे और ईश्वर में आस्था रखने वाले बालक थे।
एक बार धन्ना के परिवार के कुलगुरु, पंडित त्रिलोचन, तीर्थयात्रा से लौटकर उनके घर पर कुछ दिनों के लिए ठहरे। पंडित त्रिलोचन प्रतिदिन शालिग्राम शिला की बड़े भाव से पूजा-अर्चना करते, उन्हें फूल चढ़ाते और भोग लगाने के बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करते थे। बालक धन्ना यह सब बड़े ध्यान से देखते और भगवान की सेवा के प्रति उनके मन में गहरा आकर्षण उत्पन्न हो गया।
जब पंडित जी जाने लगे तो धन्ना ने उनसे शालिग्राम पत्थर लेने की जिद पकड़ ली। माता-पिता के बहुत समझाने पर भी वे नहीं माने। आखिर में, यह सोचकर कि बालक है और असली-नकली पत्थर में भेद नहीं कर पाएगा, पंडित जी ने नदी से एक गोल-मटोल काला पत्थर उठाया और धन्ना को शालिग्राम बताकर दे दिया।
अब धन्ना बहुत प्रसन्न थे। वे अपने “ठाकुर जी” को अपने साथ खेतों में गाय चराने भी ले जाते। उनकी माँ उन्हें खाने के लिए बाजरे की रोटी और गुड़ दिया करती थीं। पंडित जी की तरह ही धन्ना ने भी निश्चय किया कि वे ठाकुर जी को भोग लगाए बिना भोजन नहीं करेंगे।
उन्होंने पत्थर के सामने रोटी रखकर भोग लगाने के लिए आवाज लगाई, लेकिन पत्थर कैसे भोग लगाता? धन्ना ने हठ कर लिया कि जब तक ठाकुर जी स्वयं प्रकट होकर भोग नहीं लगाएंगे, वे भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। तीन दिन बीत गए, धन्ना भूखे-प्यासे बैठे रहे। चौथे दिन, जब उनकी माँ फिर से रोटी लेकर आईं, तो धन्ना खेतों में जोर-जोर से रोने लगे।
वे ठाकुर जी से प्रार्थना करने लगे, “हे ठाकुर जी! आप तो बड़े वाले ठाकुर जी हैं, आपको तो छप्पन भोग मिलते होंगे। मैं तो एक छोटा बालक हूँ और तीन दिन से भूखा हूँ। क्या आपको मुझ पर दया नहीं आती? मुझ पर दया करके थोड़ा सा भोग लगा लीजिए ताकि मैं भी कुछ खा सकूँ।”
धन्ना की इस भोली और सच्ची पुकार को सुनकर भगवान श्री कृष्ण साक्षात प्रकट हो गए। अपने ठाकुर जी को अपने सामने देखकर धन्ना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने भगवान को बाजरे की रोटी और गुड़ खाने को दिया। भगवान बड़े प्रेम से खाने लगे। जब भगवान ने दो रोटियाँ खा लीं और तीसरी उठाने लगे तो धन्ना ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा, “सारी रोटियाँ आप ही खा जाएँगे क्या? मुझे भी भूख लगी है, मैंने चार दिन से कुछ नहीं खाया।” यह सुनकर भगवान मुस्कुरा दिए और बची हुई दो रोटियाँ धन्ना ने खाईं।
यह कहानी भक्त धन्ना की निश्छल भक्ति और विश्वास की शक्ति को दर्शाती है, जिसके कारण स्वयं भगवान को उनके लिए प्रकट होना पड़ा।
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